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आईआईएमसी के बारे में

जनसंचार रुचि के प्रमुख क्षेत्र के रूप में उभरा है और समाज के विकास और सशक्तिकरण में इसका बहुत योगदान है हालांकि शास्त्र के रूप में यह नया है फिर भी इसका महत्व तेजी से बढ़ा है और छात्र-छात्राओं के लिए यह बड़ा आकर्षण बन गया है। संचार माध्यमों के विस्तार में सूचना क्रांति ने प्रमुख भूमिका निभायी है । इसने छात्रों, शिक्षकों और संचारकर्मियों के लिए कई बड़ी चुनौतियां खड़ी की हैं । प्रौद्योगिकी में जितनी तेजी से बदलाव आ रहा है, उतनी ही तेजी से इस शास्त्र का स्वरूप भी बदल रहा है । शिक्षा के किसी दूसरे क्षेत्र में ऐसा नहीं हो रहा है । सूचना प्रौद्योगिकी से उभर रही चुनौती भारतीय जन संचार संस्थान के प्रशिक्षण का अनिवार्य अंग है ।

संस्थान संचार को विकास का उत्प्रेरक मानता है और विश्वस्तरीय शिक्षण, प्रशिक्षण और शोध के द्वारा समाज को लाभ पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है । यह अत्यंत प्रतियोगी विश्व से प्राप्त चुनौतियों का सामना करने के लिए विद्यार्थियों को तैयार कर रहा है । संस्थान के प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रतियोगी विश्व की चुनौतियों और विकासशील देश की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैें । इस अर्थ में भारतीय जन संचार संस्थान देश और विदेश के जनसंचार प्रशिक्षण केन्द्रों से अलग है । यही विशेषता इस संस्थान के विद्यार्थियों को अलग पहचान और चरित्र प्रदान करती है ।

भारतीय जन संचार संस्थान को जनसंचार के शिक्षण, प्रशिक्षण तथा शोघ के क्षेत्र मे गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है । प्रतिवर्ष मीडिया और व्यावसायिक निकायों में किए जाने वाले मूल्यांकनों से जिसका आभास होता है ।

पिछले दो दशकों से भी अधिक समय में संस्थान ने अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं तेजी से बढ़ते हुए मीडिया और संचार उद्योग के लिए आवश्यक प्रशिक्षित कर्मियों की मांग पूरी करने के लिए कई विशेष पाठ्यक्रम शुरू किए है । सूचना उद्योग में हो रही नई पहलकदमियों से जो चुनौतियां पैदा हो रही हैं, उनसे निपटने के लिए संस्थान अपने कार्यक्रमों में सुधार के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है ।

हर वर्ष उद्योग की नई जरूरतों के अनुसार पाठ्यविषयों में परिवर्तन किया जाता है और संस्थान की परिषद के जरिए भारत भर के संचार विशेषज्ञों से आए सुझावों को शामिल किया जाता है। संस्थान का प्रबंध एक स्वशासी भारतीय जन संचार संस्थान समिति करती है । यह समिति सोसायटी पंजीकरण कानून, 1860 के अन्तर्गत पंजीकृत है । इसका पूरा खर्च सूचना और प्रसारण मंत्रालय के जरिए भारत सरकार उठाती है । भारतीय जन संचार संस्थान समिति की बैठक वर्ष में एक बार होती है । कार्यकारी परिषद प्रबंध कार्य करती है । दोनों ही समितियों में अध्यक्ष एंव संस्थान के महानिदेशक के अलावा भारत सरकार के प्रतिनिधियों के अलावा विख्यात संचारकर्मी और संकाय के प्रतिनिधि शामिल होते हैं ।

संस्थान का उद्घाटन 17 अगस्त 1965 को तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने किया था। इसकी शुरूआत बहुत कम कर्मचारियों से हुई । उस समय इसके कार्य में युनेस्को के दो सलाहकार भी मदद दे रहे थे । शुरू के कुछ वर्षों में संस्थान ने मुख्यतः केन्द्रीय सूचना सेवा के अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया। कुछ शोध परियोजनाएं भी हाथ में ली गईं।

1969 में संस्थान के एक महत्वपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आरम्भ किया। अंग्रेजी में स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम में एशिया और अफ्रीका के युवा पत्रकारों को प्रवेश दिया गया। केन्द्र और राज्य सरकारों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के प्रचार/जनसम्पर्क विभागों से जुड़े हुए संचारकर्मियों के प्रशिक्षण की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष अल्पकालीन पाठ्यक्रम शुरू किए गए। इनकी अवधि एक सप्ताह से तीन महीने तक थी।

भारतीय जन संचार संस्थान विश्व का ऐसा पहला और एकमात्र संस्थान है, जिसने अब तक उर्दू, उडि़या, गुजराती, मराठी और हिन्दी जैसी पांच आधुनिक भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित किएसंस्थान के प्रशिक्षण कार्यक्रमों और उनमें प्रशिक्षित युवा संचारकर्मियों ने देश-विदेश के संचार परिदृश्य पर जो छाप छोड़ी उससे यह मांग पैदा हुई कि संस्थान के केन्द्र देश के अन्य क्षेत्रों में भी खोले जाने चाहिए । पूर्वी भारत की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए 1993 में ढेंकनाल (उड़ीसा) में पहला केन्द्र खोला गया ।

इस समय वहां अंग्रेजी एवं उडि़या माध्यम से स्नातकोत्तर पत्रकारिता डिप्लोमा पाठ्यक्रम चलाये जा रहे है। इसमें प्रशिक्षित छात्रों को भी दिल्ली में पढ़े हुए छात्रों की तरह कई राज्यों के समाचारपत्रों में तुरन्त रोजगार मिला है । पश्चिमी और उत्तर-पूर्व क्षेत्र में संस्थान के केन्द्र खोल